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बच्चों के झूले उखाड़ने का खेल या विकास के नाम पर नया खेल? वार्ड परिसीमन, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और निगम की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

 

बच्चों के झूले उखाड़ने का खेल या विकास के नाम पर नया खेल?

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वार्ड परिसीमन, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और निगम की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

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पहले जनता के पैसे से झूले लगवाए गए, अब उन्हीं झूलों को उखाड़कर दूसरी जगह लगाने की तैयारी, आखिर क्यों?

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(Ecoindiatoday)कोरबा :- वार्ड क्रमांक 53 के चोरभट्टी स्थित जनकपुरी मोहल्ले में बच्चों के लिए लगाए गए झूलों को उखाड़े जाने का मामला अब केवल खेल सामग्री हटाने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके बहाने नगर निगम की कार्यप्रणाली, वार्ड परिसीमन, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और विकास कार्यों में पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।

स्थानीय महिलाओं के अनुसार खेल मैदान में लगे झूलों को हटाने का कार्य किया जा रहा था, जिसका उन्होंने तत्काल विरोध किया। महिलाओं ने वार्ड पार्षद श्रीमती सम्मत कंवर को फोन कर इसकी जानकारी दी। कुछ समय बाद वार्ड क्रमांक 52 के पार्षद सरोज शांडिल्य (बंटी) मौके पर पहुंचे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उन्होंने झूलों को अन्यत्र लगाने की बात कही। जब महिलाओं ने इसका विरोध किया तो बाद में उन्हें आश्वस्त किया गया कि झूलों को पुनः स्थापित कर दिया जाएगा।

 

स्थानीय नागरिक पूछ रहे हैं कि यदि झूले वापस लगाने ही थे तो उन्हें उखाड़ा क्यों गया? यदि वे अनुपयोगी थे तो वर्षों से उनका उपयोग कैसे हो रहा था? और यदि उपयोगी थे तो उन्हें हटाने की जरूरत क्या थी? आखिर ऐसा कौन-सा विकास मॉडल है जिसमें पहले सरकारी धन से सामग्री लगाई जाती है और फिर उसी सामग्री को उखाड़कर दूसरी जगह ले जाने की तैयारी शुरू हो जाती है?

लोगों का कहना है कि पूर्व पार्षद क्षेत्रवासियों की मांग पर बच्चों के लिए यह सुविधा उपलब्ध कराई थी। ऐसे में किसी भी प्रकार की कार्रवाई से पहले स्थानीय नागरिकों की राय लेना आवश्यक था। लेकिन यहां ऐसा प्रतीत होता है कि जनता से संवाद स्थापित करने के बजाय निर्णय थोपने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।

क्या विकास के नाम पर अनियमितताओं की नई पटकथा लिखी जा रही है?

क्षेत्रवासियों का कहना है कि नगर निगम में पहले भी कई विकास कार्यों को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं। ऐसे में पुराने और उपयोगी झूलों को उखाड़कर दूसरी जगह ले जाने की कवायद को लेकर लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। नागरिक पूछ रहे हैं कि कहीं यह पूरी प्रक्रिया अनावश्यक खर्च, कागजी कार्रवाई और विकास कार्यों के नाम पर होने वाली संभावित अनियमितताओं का हिस्सा तो नहीं?

लोगों का कहना है कि यदि किसी नई जगह झूले लगाने की आवश्यकता थी तो वहां नए झूले लगाए जाने चाहिए थे। पुराने स्थान से बच्चों की सुविधा छीनकर दूसरी जगह सुविधा उपलब्ध कराने का तर्क समझ से परे है।

वार्ड परिसीमन पर भी खड़े हुए सवाल

मामले में नया मोड़ तब आया जब वार्ड पार्षद श्रीमती सम्मत कंवर से चर्चा की गई। उनके पति ने बताया कि संबंधित मोहल्ला अब उनके वार्ड क्षेत्र में नहीं आता और वार्डों के नए सीमांकन के बाद यह क्षेत्र वार्ड क्रमांक 52 में शामिल हो गया है।

यहीं से स्थानीय नागरिकों की नाराजगी और बढ़ गई है।

क्षेत्रवासियों का कहना है कि चुनाव के दौरान यह क्षेत्र वार्ड क्रमांक 53 में था। उन्होंने मतदान भी वार्ड 53 की प्रत्याशी को किया था। अब अचानक यह क्षेत्र वार्ड 52 में कैसे चला गया? परिसीमन कब हुआ? किस आधार पर हुआ? इसकी जानकारी आम नागरिकों को क्यों नहीं दी गई?

लोगों का कहना है कि लोकतंत्र में यह स्थिति विचित्र है कि वोट किसी को दिया जाए और काम के लिए किसी दूसरे जनप्रतिनिधि के पास जाना पड़े। यदि ऐसा है तो फिर जनता की सहमति और जानकारी का महत्व क्या रह जाता है?

सड़कें टूटीं, गंदगी बरकरार, लेकिन झूले हटाने की फुर्सत

महिलाओं और स्थानीय रहवासियों का कहना है कि मोहल्ले में कई मूलभूत समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं। जगह-जगह सड़कें खराब हैं, सफाई व्यवस्था संतोषजनक नहीं है और कई आवश्यक विकास कार्य लंबित हैं। ऐसे में जनप्रतिनिधियों का ध्यान इन समस्याओं पर केंद्रित होने के बजाय बच्चों के खेल उपकरणों को हटाने में दिखाई देना लोगों को हैरान कर रहा है।

नागरिकों का कहना है कि यदि इतनी ही सक्रियता सड़कों, नालियों और सफाई व्यवस्था को सुधारने में दिखाई जाती तो क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती थी।

सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी

फिलहाल झूलों को दोबारा लगाने का आश्वासन दिया गया है। लेकिन क्षेत्रवासियों की नजर अब इस बात पर टिकी हुई है कि जिन झूलों को उखाड़कर ले जाया गया है, क्या वे वास्तव में उसी स्थान पर पुनः लगाए जाएंगे या फिर यह मामला भी अन्य विवादित विकास कार्यों की तरह फाइलों और आश्वासनों में सिमट जाएगा?

जनता जानना चाहती है कि यह कार्रवाई किसके निर्देश पर हुई, किस विभाग ने अनुमति दी, क्या कोई प्रस्ताव पारित हुआ था और आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि बच्चों की वर्षों पुरानी सुविधा को हटाने की नौबत आ गई?

क्योंकि सवाल केवल एक झूले का नहीं है, सवाल जनता की भागीदारी, विकास कार्यों की पारदर्शिता और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का है।

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Rajesh Sharma

इको इंडिया टुडे न्यूज़ से जुड़े एक अनुभवी पत्रकार हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्षों से व्यापक अनुभव प्राप्त है। अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने आर्थिक, औद्योगिक, सामाजिक और विकास से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर प्रभावशाली रिपोर्टिंग की है।

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